मुसलिम लड़कियों के सामने शादी की समस्या

>> Friday, June 26, 2009

नहीं मिल रहे काबिल दूल्हे



  • मूवमेंट फॉर मुसलिम इंपावरमेंट के सर्वे से खुलासा




- अभिभावकों की तरफ से यह जायज समस्या अब सामने आ रही है, उनकी पढ़ी लिखी और काबिल बेटियों के हिसाब से रिश्ते नहीं मिल रहे हैं। - काजी, शरई अदालत दारुल कजा


- मुसलिम समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है। प्रोफेशनल पढ़ाई कर चुकी काबिल लड़कियों के रिश्ते के लिए समाजसेवी संगठनों को आगे आना चाहिए। - मुसलिम लड़की,



  • शरई अदालत दारुल कजा के सामने आ रहे दूल्हों की कमी के मामले

  • प्रोफेशनल कोर्स करने में लड़कियां आगे, लड़के फिसड्डी

  • पढ़ाई में मुसलिम लड़कों और लड़कियों में अनुपातिक अंतर
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प्रोफेशनल पढ़ाई में मुसलिम लड़कियों के बढ़ते कदम ने उनके अभिभावकों के सामने एक नई समस्या खड़ी कर दी है। ज्यादा पढ़ जाने से समाज में उनके लायक लड़कों की कमी हो गई है। व्यवसायिक शिक्षा में लड़कियों के लड़कों से आगे होने का खुलासा मूवमेंट फॉर मुसलिम इंपावरमेंट के सर्वे से हो चुका है। अब ऐसी लड़कियों के लिए लायक दूल्हों की कमी के मामले गाहे-बगाहे मुसलिम बुद्धिजीवियों और शरई अदालत दारुल कजा के सामने आ रहे हैं।

सर्वे के मुताबिक 60 फीसदी लड़कियां और 40 फीसदी लड़के व्यवसायिक शिक्षा ले रहे हैं। लेकिन मुसलिम समाज में प्रोफेशनल और नौकरीपेशा लड़कों की कमी से उनके सामने बेटियों की शादियों का संकट खड़ा हो गया है। सर्वे 600 प्रोफेशनल छात्र-छात्राओं पर कराया गया था। इसमें से करीब 370 लड़कियां और 230 लड़के विभिन्न क्षेत्रों में व्यवसायिक शिक्षा ले रहे हैं।

मूवमेंट फॉर मुसलिम इंपावरमेंट के महासचिव डा। इशरत सिद्दीकी ने बताया कि अभिभावक अपनी बेटियों के लिए प्रोफेशनल और नौकरीपेशा लड़कों की तलाश कर रहे हैं, जिनमें अनुपातिक अंतर है। इनमें ज्यादातर लड़कियां मध्यम वर्गीय परिवार की हैं। जिनके अभिभावक तृतीय श्रेणी सरकारी कर्मचारी या बिजनेस से जुड़े हैं। मुसलिम लड़कियों ने एमबीबीएस, बीटेक, बीफार्मा, फिजियोथिरेपी, फैशन डिजाइनिंग, बीएड, एमबीए और एमसीए, एलएलबी को कैरियर के रूप में चुना है।

शरई अदालत दारुल कजा के काजी मौलाना इनाम उल्ला ने बताया कि अभिभावकों की तरफ से यह जायज समस्या अब सामने आ रही है, उनकी पढ़ी लिखी और काबिल बेटियों के हिसाब से रिश्ते नहीं मिल रहे हैं। लड़के रोजगार से जुड़े हैं, लेकिन किसी का गैरेज है तो किसी की आटोमोबाइल की दुकान। अकसर मां-बाप सलाह मशविरा के लिए दारुल कजा आते हैं।

महंगी प्रोफेशनल पढ़ाई में अभिभावकों को काफी दिक्कतें आईं। इनमें से कुछ को निगेटिव एरिया के तौर पर चिन्ही़त होने पर लोन नहीं मिला। महंगी कोचिंग होने के कारण घरों में लड़कियों ने प्रवेश परीक्षा की तैयारी की।

  • नौबस्ता की शीरी बीटेक, फराह खानम बीटेक, नवाबगंज की बेनिस फैजाबाद से बीटेक कर रही हैं। कुछ लोगों को मेरिट कम मींस वजीफा योजना के तहत फायदा हुआ।
    - बेकनगंज की मदनी बहनों ने भी चुनौतियों का सामना कर वकालत में अपनी जड़ें जमाई हैं। नाज मदनी, मुमताज अनवरी और फिरोज अनवरी वकालत कर रही हैं। नाज मदनी ने बताया कि मुसलिम समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है। प्रोफेशनल पढ़ाई कर चुकी काबिल लड़कियों के रिश्ते के लिए समाजसेवी संगठनों को आगे आना चाहिए।
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मुस्लिम लड़कियों में साक्षरता दर बढ़ी
अलीगढ़ में मुसलिम लड़कियों की शिक्षा का प्रतिशत दस साल में तेजी से बढ़ा है। अगले छह साल यानी 2015 और उसके बाद मुसलिम लड़कियों का प्रतिशत लड़कों से अधिक हो जाने की संभावना है।
अमुवि में वर्ष 1999 में मुसलिम लड़कियों का प्रतिशत विभिन्न संकायों में 18 से 22 था, जो कि 2009 में बढ़कर 37 से 40 फीसदी तक पहुंच गया है। जिले में मुसलिम लड़कियों के लिए शिक्षा की बुनियाद अमुवि के संस्थापक सर सैयद अहमद खान ने रखी थी। जिसे शेख अब्दुल्ला ने लड़कियों के लिए अब्दुल्ला कालेज की स्थापना कराकर आगे बढ़ाया।



मुसलिम लड़कियों में शिक्षा के लिए संघर्ष अमुवि के रजिस्ट्रार रहे सज्जाद हैदर की पत्नी नाजरे हैदर ने किया। वह खुद पढ़ीं और आसपास की लड़कियों को पढ़ाने के लिए समाज की चुनौतियों को स्वीकार कर संघर्ष करती रहीं। यहां तक कि उन्होंने अपनी बेटी कुर्तल एन हैदर को बढ़ाया नहीं बल्कि प्र यात उर्दू की लेखक बनाया।



हालांकि अमुवि के पीआरओ राहत अबरार ने बताया कि उनके मित्र चर्चा करते हैं कि लड़कियां पढ़ी लिखी होने पर उनकी शादी के लिए लड़के देखने में चुनौती का सामना करना पड़ता है।

धर्मशास्त्र विभाग के शिक्षक डा. मु ती जाहिद ए खान ने बताया कि समाज में पढ़ी-लिखी लड़कियों के लिए लड़के देखने में परेशानी सामने आ रही है।

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गाजियाबाद की शुभ्रा आईएएस टापर

>> Thursday, May 7, 2009


शुभ्रा आईएएस टापर



सिविल सेवा परीक्षा 2008 में गाजियाबाद की रहने वाली शुभ्रा सक्सेना ने सबको पछाड़ कर शीर्ष स्थान हासिल किया है। आकर्षक वेतन वाली साफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी छोड़ सिविल सेवा चुनने वाली शुभ्रा का इरादा गांवों में रहने वाली जनता के लिए कुछ करने का है। झारखंड के बोकारो में कोयला खदान श्रमिकों में फैली गरीबी को देख कर ही उन्होंने आईएएस बनने का निश्चय किया था।





इस बार सिविल सेवा परीक्षा की सफलता सूची में लड़कियों का बोलबाला रहा। पहले तीन स्थानों पर लड़कियों ने बाजी मारी। दूसरे स्थान पर शरणनदीप कौर बरार और तीसरे स्थान पर किरण कौशल रहीं। चौथे स्थान पर वरिंदर कुमार रहे।





गाजियाबाद में शिप्रा सनसिटी की विंडसर एंड नोवा [फ्लैट-82] निवासी शशांक गुप्ता की पत्नी शुभ्रा सक्सेना मूलरूप से बरेली की रहने वाली हैं। शुभ्रा के पिता अशोक चंद्र सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड [सीसीएल] बोकारो में अधिशासी अभियंता हैं। शुभ्रा ने डीएवी पब्लिक स्कूल ढोरी, बोकारो से दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। केसीएम स्कूल, मुरादाबाद से इंटरमीडिएट करने के बाद आईआईटी रुड़की से बीटेक किया।





दूसरे प्रयास में शुभ्रा ने सिविल सेवा परीक्षा का शिखर छू लिया। शुभ्रा की शादी छह साल पूर्व शिप्रा सनसिटी के विंडसर एंड नोवा में रहने वाले शशांक गुप्ता से हुई, जो वर्तमान में नोएडा स्थित सीएससी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। शुभ्रा अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता, पति व दोस्तों को देती हैं, लेकिन इस बीच वह शिक्षक [गाइड] मुकुल पाठक की सराहना करने से भी पीछे नहीं रहतीं।





शुभ्रा की सफलता पर उनके ननिहाल मुरादाबाद में भी खुशी की लहर है। शुभ्रा के नाना आर.एन. वर्मा के घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा रहा।





इस साल सिविल सेवा परीक्षा में कुल 791 उम्मीदवार सफल हुए। इनमें जनरल के 364, ओबीसी के 236 और एससी वर्ग के 61 छात्र शामिल हैं। टाप 25 में दस लड़कियां हैं। इस बार कुल 3,18,843 उम्मीदवारों ने फार्म भरा जिनमें 1,67,035 प्रारंभिक परीक्षा में बैठे। इनमें 11,849 ने प्रारंभिक परीक्षा पास की और मुख्य परीक्षा में शामिल हुए। आखिर में 2,140 को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया।

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महिला दिवस पर स्पेशल स्टोरी : दिलेर दूल्हन मंजू

>> Friday, March 6, 2009

- और अब मंजू
- दिलेर दूल्हन मंजू को सलाम
- मंजू का मंजूर नहीं लालची दूल्हा

महिला दिवस पर स्पेशल स्टोरी-------------------

उसे मंजूर नहीं लालची दूल्हा... उसने लौटा दी दूल्हे की बारात... फिर भी मुश्किल में हैं वो। जी हां एक और दिलेर दूल्हन इन दिनों चर्चा में है। उसका नाम है मंजू। लखनऊ की मंजू।

यदि दहेज लोभी से शादी कराई तो जान दे दूंगी- दिलेर दूल्हन मंजू
मैं पहले अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं, इसके लिए आगे पढ़ाई करूंगी या मुझे अभी
कोई अच्छी नौकरी मिली तो वो करूंगी। मैं कहीं अच्छी सी नौकरी करना चाहती हूं यदि कोई मेरी मदद करना चाहता है तो मेरी नौकरी लगवा दे। मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती हूं। - मंजू

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न्यूज पेपर में खबर छपने के बाद दूल्हे और उसके परिजनों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई। मंजू सब कुछ भूलकर आगे की पढ़ाई का मन बना रही थी कि अचानक उसके सामने नई मुसीबत पैदा हो गयी। अब दूल्हे के परिजन के साथ उसके मां-बाप भी उसी लड़के से शादी के लिए दबाव डाल रहे हैं। 4 मार्च को राज्य महिला आयोग पहुँची मंजू का कहना है यदि दहेज लोभी से शादी कराई तो जान दे दूंगी।
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  • लालची दूल्हे की बारात को बैरंग लौटने वाली ग्रेजुएट मंजू की दिलेरी को सबने सलाम किया
  • मंजू के दर पर नेपालगंज के डाक्टर से लेकर ओमान के इंजीनियर तक के रिश्ते आने लगे
  • मंजू पहले अपने पैरों पर खड़ी होगी फिर बसाएगी अपना घर
  • एसएमएस व ई-मेल से आए रिश्तों के पैगाम देख वो रो पड़ी
  • न्याय के लिए खटखटाया महिला आयोग का दरवाजा- कहा, लालची दूल्हे से शादी की तो जान दे दूंगी
  • माता-पिता भी डाल रहे हैं उसी लड़के से शादी का दबाव
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चलिए सबसे पहले पूरे वाकये पर एक सरसरी निगाह डाल लेते हैं। लखनऊ की मंजू की शादी 26 फरवरी को तय हुई थी। जयमाला केसमय दूल्हे ने उसके पिता से एक लाख रुपए और मोटरसाइकिल की मांग कर दी। दूल्हे की जिद के चलते दिलेर मंजू ने शादी न करने का फैसला कर लिया। आखिरकार बारात बैरंग लौट गई। दूल्हे और उसके परिजनों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई। अब मंजू के माता-पिता उसी लड़के से शादी करने के लिए जबरदस्ती कर रहे हैं। मंजू ने महिला आयोग से गुहार लगाई है। उसने कहा है कि जबरदस्ती की गई तो वह खुदकुशी कर लेंगी। इस बीच मंजू के दर पर नेपालगंज के डाक्टर से लेकर ओमान के इंजीनियर तक के रिश्ते पहुंचने लगे हैं। जाति-धर्म की दीवार तोड़कर युवक इस बहादुर लड़की को अपनी जीवन साथी बनाने के इच्छुक हैं।
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अब पूरी कहानी तफसील से
-लखनऊ के तालकटोरा थाना के अंबेडकरनगर भरतपुरी बी के रहने वाले जगदीश प्रसाद की 22 वर्षीय पुत्री मंजू ने राज्य महिला आयोग को दिए प्रार्थनापत्र में बताया 26 फरवरी को उसकी मोहल्ले के विजय कुमार से शादी तय हुई थी। जयमाला के समय विजय ने उसके पिता से एक लाख रुपए तथा मोटरसाइकिल मांग ली। घरवालों के लाख समझाने पर भी वह जिद पर अड़ा रहा। इसलिए मैंने उससे विवाह करने से मना कर दिया।
अगले दिन अखबार में इसकी खबर छपने के बाद विजय को कानूनी फंदे से बचाने के लिए उसके घरवाले शादी के लिए जोर डालने लगे। मंजू ने यह भी बताया कि उसके माता-पिता भी उसी लड़के से शादी के लिए जबरदस्ती कर रहे हैं। खत के अंत में महिला आयोग की अध्यक्ष से गुहार लगाते हुए मंजू ने कहा यदि मुझसे जबरदस्ती की गई तो आत्महत्या कर लूंगी।
मंजू को मदद देने के लिए लविवि की पूर्व कुलपति प्रो. रूपरेखा वर्मा आगे आईं, वहीं महिला थानाध्यक्ष ने कहा बालिग लड़की की शादी बिना उसकी मर्जी के नहीं होने दी जाएगी। मां-बाप से यह बात लिखित में लेने के बाद मंजू को घर रवाना कर दिया गया।
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मंजू के लिए रिश्तों की बौछार-
मंडप पर दहेज लोभी दूल्हे से रिश्ता तोड़ने वाली दिलेर मंजू के दर पर नेपालगंज के डाक्टर से लेकर ओमान के इंजीनियर तक के रिश्ते आने लगे हैं। जाति-धर्म की दीवार तोड़कर युवक इस बहादुर लड़की को अपनी जीवन साथी बनाने के इच्छुक हैं। लखनऊ के अलावा नेपालगंज, बलिया, आगरा, चंडीगढ़ ही नहीं ओमान से आए संदेशों में मंजू से शादी की इच्छा जाहिर करने वालों की संख्या कई दर्जन थी। ओमान में इंजीनियर और बलिया निवासी आरएस मिश्र्रा मंजू से शादी करना चाहते हैं। चंडीगढ़ के ओंकार मिश्र ने मंजू के साहस की सराहना करते हुए सलाह दी ऐसे आदमी से शादी करो जिसे इंसानियत की भूख हो।
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मंजू से मिलने को मुरीदों की कतार-
मंजू के मुरीदों की कतार लंबी होती जा रही है। चर्चा है कि कई लोगों ने मंजू को मदद करने की इच्छा भी जाहिर की। कोई पढ़ाई का खर्चा उठाना चाहता है तो कोई मंजू के शादी में टेंट और लाइट का मुफ्त व्यवस्था करने को बेताब है।

अपनी शादी के लिए आए शादी के प्रस्तावों का देखकर उसके आंखों में आंसू आ गया। इन रिश्तों के बारे में उसका कहना है कि वो पहले लड़के से मिल कर साफ साफ बात करेगी कि कोई दहेज या किसी अन्य लालच में तो शादी नहीं कर रहा है तब वर चुनेगी।

वही मंजू का कहना है कि मैं पहले अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं, इसके लिए आगे पढ़ाई करूंगी या मुझे अभी कोई अच्छी नौकरी मिली तो वो करूंगी। उसका कहना है कि मैं कहीं अच्छी सी नौकरी करना चाहती हूं यदि कोई मेरी मदद करना चाहता है तो मेरी नौकरी लगवा दे। मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती हूं।

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ओबामा की एक पाती बेटियों के नाम

>> Friday, January 16, 2009

मेरी सबसे बड़ी खुशी तुम दोनों हो - अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति

एक पिता के रूप में ओबामा ने 10 साल की मालिया व सात साल की साशा को यह समझाने की कोशिश की है कि आखिर उन्होंने यह राह क्यों चुनी और वह उनसे क्या अपेक्षा रखते हैं।

ये सब मैं तुम दोनों के लिए चाहता था। मैं चाहता था कि तुम दोनों ऐसे माहौल में बढ़ो
जहां कोई उपलब्धि तुम्हारी पहुंच के बाहर न हो। सोचने की कोई सीमा न हो। जहां तुम
दोनों एक प्रतिबद्ध महिलाओं के रूप में बड़ी हो सको, जो एक सुंदर दुनिया के निर्माण
में योगदान दे। मैं चाहता हूं जो मौके तुम्हें मिले हैं वह देश के हर बच्चे को
मिले।


  • मेरे लिए कोई उपलब्धि बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह गई।

  • मेरी सबसे बड़ी खुशी तुम दोनों हो।

  • मैं तुम्हें खुश नहीं रख सकता तो मेरी जिंदगी के कोई मायने नहीं है।

  • मैं हर बच्चे को स्कूल जाते देखना चाहता हूं।

  • मैं चाहता हूं कि उन्हें अच्छी नौकरी मिले और वे सफल इनसान बनें।

Friday 16 Jan, 2009 08:17 AM

ह्वाइट हाउस में आने से ठीक पहले अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी दोनों बेटियों को एक खत लिखा है। एक पिता के रूप में ओबामा ने 10 साल की मालिया व सात साल की साशा को यह समझाने की कोशिश की है कि आखिर उन्होंने यह राह क्यों चुनी और वह उनसे क्या अपेक्षा रखते हैं। बेटियों के नाम उनका पत्र परेड मैगजीन में छपा है। ओबामा ने लिखा है, ये सब मैं तुम दोनों के लिए चाहता था। मैं चाहता था कि तुम दोनों ऐसे माहौल में बढ़ो जहां कोई उपलब्धि तुम्हारी पहुंच के बाहर न हो। सोचने की कोई सीमा न हो। जहां तुम दोनों एक प्रतिबद्ध महिलाओं के रूप में बड़ी हो सको, जो एक सुंदर दुनिया के निर्माण में योगदान दे। मैं चाहता हूं जो मौके तुम्हें मिले हैं वह देश के हर बच्चे को मिले।

चुनाव प्रचार के चलते उन्हें अपनी बेटियों से दो साल तक दूर रहना पड़ा था। उन्होंने खेद जताते हुए लिखा है, मुझे तुम पर नाज है। मुझे पता है पिछले दो वर्षो में तुमने मुझे कितना याद किया होगा। संयम बनाए रखने के लिए मैं तुम्हारा आभारी हूं। आज मैं तुम्हें बताता हूं कि मैंने क्यों अपने परिवार के लिए यह रास्ता चुना। किसी भी अन्य व्यक्ति की तरह मैं भी सफल होना चाहता था। लेकिन पिता बनने के बाद सब कुछ बदल गया।

अचानक मुझे लगा कि मेरे लिए कोई उपलब्धि बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह गई। मैंने पाया कि मेरी सबसे बड़ी खुशी तुम दोनों हो। मुझे एहसास हुआ कि यदि मैं तुम्हें खुश नहीं रख सकता तो मेरी जिंदगी के कोई मायने नहीं है। मेरी बच्चियों, इसीलिए मैं राष्ट्रपति बनने की दौड़ में शामिल हुआ। ओबामा ने लिखा है, मैं हर बच्चे को स्कूल जाते देखना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि उन्हें अच्छी नौकरी मिले और वे सफल इनसान बनें।

साभार / स्‍त्रोत -

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चार बहनों की खुदकुशी का मामला

>> Monday, October 13, 2008

मध्यप्रदेश के भिंड जिले में चार बहनों की खुदकुशी का मामला


सामूहिक आत्महत्या। चार बहनों ने एक साथ सल्फास खाकर खुदकुशी कर ली। वाकया मध्यप्रदेश के भिंड जिले के एक गांव का है।

घटना के पीछे वजह क्या है यह तो अभी तक सामने नहीं आ पायी है। लेकिन चारों बहनों के भगवान कृष्ण की परमभक्त होने को इसकी वजह माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि जिस तरह मीरा ने भगवान कृष्ण केलिए विष का प्याला पिया था। उसी तरह इन बहनों ने कृष्ण के लिए सल्फास की गोलियां खाकर खुदकुशी कर ली।

जब तक सच्चाई सामने नहीं आती तब तक .... ऐसी ऊल-जुलूल बातों को फैलने से रोका जाना चाहिए। वर्ना ऐसी घटनाओं के दुबारा-तीबारा होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।


बच्चे अगर ऐसे किसी मनोविज्ञान के शिकार हो रहे हैं, तो इसे रोकने की दिशा में ठोस पहल होना चाहिए। न कि इसे बेवजह का बढ़ावा दिया जाए।


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जवाब की राह ताकता सती का सवाल

जवाब की राह ताकता सती का सवाल
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सती की गति न जाने कोय
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कई ऐसे उदाहरण देखने को मिलते है कि औरत को जबर्दस्ती सती कराया गया। लेकिन आज की सती महिलाओं को किसने सती करवाया। यह सवाल कब तक जवाब की राह देखता रहेगा। हम सबको मिलकर इसका जवाब जल्द से जल्द खोजना पड़ेगा। वर्ना जाने और कितनी महिलाएं सती हो जाएंगी।
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फिर एक औरत सती हो गई। इधर के कुछ सालों का इतिहास खंगालें तो यह कोई पांचवी-छठी घटना होगी।

दूसरी अन्य समस्याओं की तरह अगर हम यह मानकर चलने लगे कि सती प्रथा के रोकथाम की कोई भी कोशिश कामयाब नहीं होगी, तो फिर नहीं ही होगीं। इसलिए हमें पाजिटीव ही सोचना होगा।

अब हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि ... क्या कारण है जो आज भी सती जैसी घटनाएं हो रही है। घटनाओं पर नजर डालें तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि सभी घटनाएं अनपढ़, अशिक्षित और निम्न वर्ग के बीच घट रही है। यानी ऐसी जगह जहां जागरूकता की कमी है। महिलाओं में आज भी पति को परमेश्वर और सर्वस्व मानने की प्रथा है। पति केसाथ ही मरना उन्हें अपना प्रथम कर्तव्य जान पड़ता है। उन महिलाओं को सती होने में आत्महत्या जैसा बोध भी नहीं होता। क्योंकि आत्महत्या करने वाला किसी न किसी परेशानी और मजबूरी केचलते करता है। यानी जीवन से हार कर। मगर इन महिलाओं ने सती होने का फैसला अपनी खुशी से लिया।

यह बात समझ से परे है कि आखिर कैसे सती हुई महिलाओं के मन में यह बात बैठ जाती है कि उन्हें पति के साथ सती होना है। इतिहास में झांके तो पता चलता है कि पहले महिलाओं ने पति के नहीं रहने के बाद दुश्मन सेनाओं के कहर, अपमान से बचने के लिए जौहर होना या सती होना शुरू किया। लेकिन बाद में महिलाओं को पति की मौत के बाद सती होने के लिए मजबूर किया जाने लगा।

कई ऐसे उदाहरण देखने को मिलते है कि औरत को जबर्दस्ती सती कराया गया। लेकिन आज की सती महिलाओं को किसने सती करवाया। यह सवाल कब तक जवाब की राह देखता रहेगा। हम सबको मिलकर इसका जवाब जल्द से जल्द खोजना पड़ेगा। वर्ना जाने और कितनी महिलाएं सती हो जाएंगी।


http://www.bhaskar.com/2008/10/13/0810131125_lalmati_pious.html

http://www.bhaskar.com/2008/10/13/0810131125_lalmati_pious.html

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मां को घर से निकालने पर बेटों पर मामला दर्ज

>> Saturday, October 4, 2008

मां को घर से निकालने पर बेटों पर मामला दर्ज

भास्कर नेटवर्कSaturday, October 04, 2008 03:29 [IST]

ग्वालियर.केरल के बाद मध्यप्रदेश के ग्वालियर की बहोड़ापुर पुलिस ने सत्तर साल की बूढ़ी मां को घर से निकाल देने वाले बेटों के खिलाफ मेंटेनेंस वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है।
पुलिस के मुताबिक, जानकीबाई कुशवाह (70) ने पति की मौत के बाद जायदाद अपने दो बेटों सूरज और मोहन में बांट दी थी। बेटों ने कुछ दिन तक तो मां को साथ रखा और इसके बाद उसे घर से निकाल दिया। महिला तब से ही भंडारे और लंगर में भोजन कर जीवनयापन कर रही थी। पिछले कुछ दिनों में तीन-चार बार महिला पुलिस के पास बेटों के अत्याचार की शिकायत लेकर पहुंची थी।
तब पुलिस ने कह दिया था कि वह एक बार और अपने बेटों को समझाने का प्रयास करे। वीरवार शाम को महिला दोबारा थाने पहुंची तो पुलिस ने इसके बेटों के खिलाफ मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया।
केरल में दर्ज हुआ था पहला मामला :
वृद्ध मां-बाप की देखभाल न करने वाले पुत्र-पुत्रियों पर कार्रवाई करने वाले इस कानून के तहत पहला मामला केरल के कोल्लम कस्बे में महिला लक्ष्मीकुट्टी की शिकायत पर एक सप्ताह पहले दर्ज किया गया था।

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