बुधवार, 26 मार्च 2008

पर्सनल समस्या को सार्वजनिक कर रहा हूँ

पर्सनल समस्या को सार्वजनिक कर रहा हूँ

इस उम्मीद के साथ कि...

कुछ हल निकल आए आप दोस्तों की मदद से

सवाल है आख़िर क्यों महिला को आगे बढने से रोका जाता है।

क्या इसलिए कि पुरुष के मन में डर होता है कि सत्ता उसके हाथ से चली जायेगी ...

किसी को कमजोर ... असहाय ... बनाने का मतलब ही होता है उसको गुलाम बनाना ।

नारी का भविष्य तय करने का हक़ किसने पुरुष को दिया ...

शादी के बाद महिला के जीवन को खत्म करने कि कोशिश क्यों कि जाती है ...
एक महिला शादी के बाद, आगे बढने के लिए सोचती है तो इसमें ग़लत क्या है ...

क्यों पति उसकी पढाई रोक देता है ...आख़िर क्या हल है ...इसका ...


21 वी सदी में आकर भी कुछ लोग है जो... 16 वी, 17 वी सदी में जी रहे है ...




तृष्णा

डेल्ही

trishnatansari@gmail.com



गुरुवार, 13 मार्च 2008

सीमोन द बुआ के देश में बेबी हालदार

सीमोन द बुआ के देश में बेबी हालदार


पहली बार में यह सुनकर यकीन करना बहुत मुश्किल होता है कि दूसरों को घरमें झाड़ू-पोंछा करने वाली लड़की एक लेखिका भी बन सकती है, मगर बेबीहालदार ने इसे हकीकत में बदल दिया. उनकी पहली किताब आलो आंधारि कोजबरदस्त सफलता मिली. बीते साल यह किताब हिंदी में प्रकाशित हुई और अब तकउसके दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं. इसका हिन्दी से गहरा रिश्ता हैक्योंकि प्रेमचंद के नाती प्रबोध कुमार ने न सिर्फ उन्हें अपने घऱ मेंरहने की जगह दी बल्कि उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया और उनकी पहलीकिताब को दुनिया के सामने लाए. उनकी किताब के बांग्ला संस्करण का विमोचनसुपरिचित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने किया था. खास बात यह है कि बेबी हालदारने अपनी दूसरी किताब भी पूरी कर ली है. कवि, पत्रकार और टिप्पणीकार पंकजपाराशर ने पिछले दिनों बेबी हालदार की खोज-खबर ली. प्रस्तुत हैं उनकीटिप्पणियों के कुछ अंश...

फ्लैशबैकहालदार से मिला। बेबी हालदार पांच-छह साल पहले तक गुमनाम जरूर थी मगर आजवह इतनी चर्चित है कि बर्षों से कलम घिस रहे रचनाकारों तक को उससे रश्कहो सकता है. हालांकि आज भी बेबी का ठिकाना वहीं है, प्रो. प्रबोध कुमारके घर-डी.एल.एफ.सिटी गुड़गांव में. प्यार से जिन्हें वह तातुश कहती है.बेबी साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेने हांगकांग, पेरिस से होकर आ चुकीहै और आज वह देश के भी कई शहरों में वायुयान से आती -जाती हैं, जो उनकीसंघर्ष का नतीजा है. न्यूयार्क टाइम्स, बी.बी.सी. , सीएनएन-आइ.बी.एन. आदिपर उनका इंटरव्यू आ चुका है.


लेखिका जैसा दिखना भी जरूरीबेबी हालदार कुछ महीने पहले पहली बार हांगकांग जा रही थी तो दिल्लीएयरपोर्ट पर उसे रोक दिया गया। अधिकारियों ने कहा कि यह महिला लेखिकाकैसे हो सकती है? क्योंकि अधिकारियों की समझ के अनुसार लेखिका होने केसाथ-साथ दिखना भी जरूरी है. सो बेबी उनकी नजरों में वैसा दीख नहीं रहीथी. द अदर साइड आफ साइलेंस की मशहूर लेखिका उर्वशी बुटालिया भी बेबी केसाथ थी. उनके समझाने का भी अधिकारियों पर कोई असर नहीं हुआ. नतीजतन उसदिन बेबी की फ्लाइट मिस हो गई. अगले दिन एक सांस्कृतिक रुप से संपन्नअधिकारी की बदौलत बेबी की रवानगी संभव हो पाई. वहां जाकर दुनिया भर केलेखकों ने बेबी हालदार के संघर्ष से परिचय प्राप्त किया. उसके बाद बेबीपेरिस गईं. वहां तकरीबन एक सप्ताह तक वह रहीं और फ्रेंच भाषी समाज कोअपनी प्रतिभा को लोहा मनवाया.


सिमोन के देश में बेबी हालदार


बेबी हालदार जब पेरिस पहुंची तो काफी लोगों को उनसे मिलने की उत्सुकताथी। लोग जानना चाहते थे कि एक कामवाली औरत कैसे आत्महत्या और हत्या सेबचे जीवन में इतनी ताकतवर हो सकी? फ्रांस के लोग सांस्कृतिक रुप से कितनेसंपन्न है इसका अनुमान सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि यूरोपीयलेखकों के बीच यह धारणा प्रचलित है कि जिसको पेरिस में मान्यता नहीं मिलीउसको समझो कहीं मान्यता नहीं मिली. शायद यही कारण है कि रायनेर मारियारिल्के, स्टीफन ज्विग, सार्त्र, सिमोन सबने पेरिस को अपना ठिकाना बनाया.ऐसे पाठकों के बीच बेबी हालदार एक सप्ताह तक रही। रोज कहीं भाषण देनाहोता, कहीं पाठकों के सवालों का जवाब देना होता, कहीं आटोग्राफ देना होताऔर अक्सर फ्रेंच महिलाओं के साथ देर तक बैठकर उनके सवालों का जवाब देनापड़ता. यह सब होता एक दुभाषिया के माध्यम से. वहां के लोग बेबी के सवालोंसे चमत्कृत होते. हैरत की बात यह है कि फैशन के नये-नये रुप प्रचलितकरनेवाले शहर पेरिस की फैशन पत्रिकाओं ने अपने आवरण पर बेबी को छापा,इंटरव्यू लिये.

sabhar , पंकज पाराशर के ख्बाब का दर से

शनिवार, 8 मार्च 2008

International women's Day Special : स्त्री की पहचान




पुरुष से अलग होनी चाहिए

स्त्री की पहचान


बरसों से स्त्री की पहचान उसके पिता , भाई , पति या प्रेमी के नाम से होती आ रही हैं । लेकिन अब समय आ गया है , कि स्त्री की पहचान एक पुरुष से हटकर हो। उसे अपने नाम और काम से जाना जाए , पहचाना जाए ।
हमारा मानना है कि पुरुषों को स्त्री की उतनी आजादी को खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए, जितनी आजादी वे खुद अपने लिए चाहते हैं।

बीवी कैसी हो... पति कैसा हो...ये दो सवाल... हैं तो बहुत सिम्पल... और इनके जवाब भी लोग बहुत सिम्पल से ही देते हैं। बीवी सुंदर होनी चाहिए, सुशील होनी चाहिए। पति और परिवार का ख्याल रखने वाली होनी चाहिए। कामकाजी यानी नौकरीपेशा भी होनी चाहिए। साथ ही खास बात यह है कि पत्नी नौकरीपेशा होते हुए भी पतिव्रता और पारंपरिक होनी चाहिए।... इस बात पर ज्यादा जोर दिया जाता है। ठीक उसी तरह पति की बात करें तो, पति ऐसा होना चाहिए, जो पत्नी का ख्याल रखें।

मगर हम यहां इन सब बातों के बारे में चर्चा नहीं कर रहे हैं... । बात करते हैं विषय पर, बीवी कैसी हो... इस सिम्पल से सवाल का जवाब कुछ यूं हो सकता है।... जवाब किसका है। पहले आप यह भी जान लीजिए। जवाब भी एक सिम्पल मैन का है। जिसकी एक सिम्पल-सी सोच है। मगर इस सिम्पल सोच में कई बड़ी बातें छिपी हुई है।

बीवी कैसी हो... तो बीवी ऐसी हो, जिसकी अपनी कोई पहचान हो, या फिर पहचान बनाने की ललक हो, कॅरियर बनाने की लगन हो, देश की जिम्मेदार नागरिक बनने की चाहत हो। देश के लिए अपना तुच्छ या बहुमूल्य योगदान देने का जज्बा हो।

हमारे इस जवाब के पक्ष-विपक्ष में कई सवाल उठ सकते हैं। पहला सवाल विपक्ष से। ये पहचान और नाम या होता है... और आप बीवियों से यह उम्मीद यों करते हो कि उनका कुछ नाम- धाम और पहचान-वहचान हो। तो जनाब, यों न उम्मीद करें...। आप क्या समझते हैं नाम-पहचान सिर्फ पुरूषों की बपौती है क्या...।

महिलाओं को शादी के बाद अपना सारा व्यक्तित्व, अपनी सारी काबिलीयत पति- बच्चे और परिवार पर न्यौछावार कर देनी चाहिए। देश कोई चीज नहीं हैं या...। चलिए देश की बात छोड़ भी दें, तो या आदमी का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता ... अपनी कोई पहचान नहीं होती है... जब पुरूषों को अपनी पहचान, अपना अस्तित्व प्यारा होता है... तब महिला यूं न अपना अस्तित्व, अपना वजूद बनाए...।

अपने अस्तित्व को लेकर सजग स्त्री

सवाल और भी उठाए जा सकते हैं। पर जवाब सबका सिर्फ एक ही है...। बदलते वक्त में स्त्री अपने अस्तित्व को लेकर सजग हो गई है। अब तक कहा जाता था कि स्त्री के लिए सबसे खतरनाक होता है उसका स्त्री होना। मगर अब स्त्री अपने ही हथियार से दुश्मनों को परास्त कर रही है।

बात जब स्त्री देह की होती है। तब आज यही कहा जाता है, स्त्री के लिए अब उसकी देह एक हथियार हो गई, एक ढाल बन गई।... क्योंकि अब तक स्त्री देह को ही एक स्त्री के कमजोरी का कारण माना जाता था। इस बात पर विचार करके स्त्री ने अब अपनी इस कमजोरी को ही सबसे बड़ा हथियार बना डाला है। स्त्री बाखूबी जानती है कि इस हथियार का इस्तेमाल कब, कहां और कैसे करना है।स्त्री देह जब से हथियार में तब्दील हुई है। उसकी धार अब पैनी हो चली है। पहले वह बोथरी हुआ करती थी। जिससे स्त्री अगर अपने इस बोथरे हथियार के जरिए किसी से मुकाबला करने के बारे में सोचती थी तो नुकसान उसी का होता था। कहावत भी इस बारे में मशहूर है कि तरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी तरबूजे पर। हलाल तो तरबूजे को ही होना है। मतलब साफ है, स्त्री-पुरूष संबंधों में भुगतना स्त्री को ही पड़ता है।

अब संबंधों का भुगतान वसूलती है स्त्री

लेकिन अब समय बदला है। स्त्री को स्त्री-पुरुष संबंधों के कारण भुगतना नहीं पड़ता, बल्कि स्त्री उसका भुगतान वसूलती है। कई स्त्री-पुरुष इसके खिलाफ बोलते मिल जाएंगे। उन्हें बोलने दीजिए। हमें भी उन्हें सुनना चाहिए। यहीं कहेंगे न आप कि अपनी देह को, हर किसी सौंप देना कहां तक उचित है।... बरसों से सुनते आ रहे है।... धर्मग्रंथों में लिखा है, देह की पवित्रता बहुत मायने रखती है। स्त्री को अपनी देह ऐसे ही थोड़ी न सबके सामने परोस देना चाहिए।

पुरुष देह की पवित्रता का ख्याल नहीं आता

हम पूछते है आपसे।... बताइए तो जरा। भला या बुराई है इस बात में।... देह उसकी है। तो इस्तेमाल करने का हक भी उसी को होना चाहिए। (पुरुषों से) आपको स्त्री देह की पवित्रता की चिंता खूब सताती है। आपको अपनी यानी पुरुष देह की पवित्रता का ख्याल नहीं आता। वैसे हमारा मानना है कि देह की पवित्रता और अपवित्रता जैसी कोई बात नहीं होती। कुछ है तो, वो है व्यक्ति की सोच, व्यक्ति का नजरिया। पूछते है आपसे।... बताइए तो जरा। भला या बुराई है इस बात में।... देह उसकी है। तो इस्तेमाल करने का हक भी उसी को होना चाहिए। (पुरुषों से) आपको स्त्री देह की पवित्रता की चिंता खूब सताती है। आपको अपनी यानी पुरुष देह की पवित्रता का ख्याल नहीं आता। वैसे हमारा मानना है कि देह की पवित्रता और अपवित्रता जैसी कोई बात नहीं होती। कुछ है तो, वो है व्यक्ति की सोच, व्यक्ति का नजरिया।

बदल रही है लोगों की सोच

विवाह संस्था पर आज सौ सवाल उठ रहे हैं। विवाह संस्था के सामने अस्तित्व को बचाए रखने का संकट है। यों। कारण, आज हर व्यवस्था बदलाव चाहती है। वक्त के हिसाब से कुछ परिवर्तन, कुछ लचीलापन मांगती है। मगर कुछ पुरूष अब भी वहां अपनी हुकूमत बरकरार रखना चाहते हैं। अपने आप को परमेश्वर कहलाना पसंद करते हैं। और जब पत्नी इस बात को इंकार करती है तो समझो बस उसकी शामत आ गई। आखिर कौन रहना चाहेगा ऐसे माहौल में। बस फिर क्या है तनाव, झगड़ा और बिखराव-तलाक।पर इधर लोगों की सोच में बदलाव आया है। अभी एक फिल्मी कलाकर का बयान आया था कि उन्हें अच्छा लगेगा, खुशी होगी। अगर उनकी पत्नी को पहले से सेक्स का अनुभव हो। यह तो सिर्फ एक पक्ष है कि पुरूष अब स्त्री की सेक्स आजादी को दबे, छिपे ही सही मगर स्वीकार करने लगे हैं। मगर बात सिर्फ सेक्स की नहीं है।

अपनी सोच को ग्लोबल बनाइए

अब हम फिर से टॉपिक पर लौटते हैं। तथाकथित पुरुष अपनी पत्नियों के खुलेपन से डरते हैं। उन्हें स्त्री के, अपनी स्त्री के अपवित्र हो जाने की चिंता सताती है। हम कहते हैं कि आपकी यह चिंता उस वक्त कहां जाती है, जब यह गुनाह, आप खुद करते हैं। स्त्री को अपवित्र करने का।... जरा सोचिए जनाब।... अपनी सोच का ग्लोबल बनाइए। अगर आप खुलापन चाहते हैं, तो दूसरों को भी खुलापन दीजिए


तृष्णा

trishnatansari@gmail.com

also read
http://dongretrishna.blogspot.com/
http://rachanakar.blogspot.com/2007/12/blog-post_24.html





शुक्रवार, 7 मार्च 2008

संबोधन की तलाश

फूल, कली या गुड़िया
कहूँ तुम्हें
शूल, चिंगारी या बारूद की पुडिया
कहूँ तुम्हें


डरता हूँ मैं
जब भी तुम्हें
गुड़िया कहने की कोशिश करता हूँ


डर इस बात का कि
कहीं मैं
तुम्हें कमजोर ना बना दूँ और ...
बारूद की पुडिया कहते वक्त भी
डर
मेरे मन में होता है कि
कहीं मैं
तुम्हारी कोमल भावनाओं
को क्षत- विक्षत तो नहीं कर रहा हूँ



लेकिन
मैं करूँ तो
क्या करूँ ?
आख़िर तुम्हें
किस नाम से संबोधित करूँ ...


तुम्हारे लिए सही
संबोधन की तलाश में
मैं कहाँ- कहाँ नहीं भटका
कोई गली, कोई चौराहा
भी शेष नहीं रहा ...
जहाँ से मुझे
तुम्हारे लिए
एक सही संबोधन मिलें ... और
मेरी समस्या का समाधान हो .


ना जाने
इस संबोधन की तलाश में
मैं कब तक यूं ही भटकता रहूंगा .
कहना जो चाहता हूँ तुझसे
पता नहीं
वो कभी
कह भी सकूँगा !

(अभी वक्त की कमी है ... सो इस कविता पर बात फ़िर कभी ... )

तृष्णा / 30 नवंबर, 2003/ CHHINDWARA

एक सितारा




जमीं अपनी ना हुई,
आसमां अपना ना हुआ ...




कहने को सारा जहाँ
अपना था,
एक सितारा मगर,
अपना ना हुआ .

तृष्णा/ 15 अगस्त, 2004/ भोपाल

इसलिए जरूरी है महिला रिजर्वेशन


भारत में महिलाओं के एक छोटे से हिस्से के लिए समान अवसर की मांग उपयुक्त हो सकती है,

पर अधिकांश महिलाओं की स्थिति ऐसी है की ...
उन्हें पुरुषों की तुलना में विशेष अवसर, रिजर्वेशन आदि की जरूरत है ।

ऐसे विशेष अवसर, रिजर्वेशन के बाद ही समान अवसर का लाभ उठा सकेंगी.

(ये बातें एक आलेख में अरूण प्रकाश ने लिखी है। मैं उनकी बात से पूरी तरह से इत्फाक रखता हूँ )




तृष्णा / 7 मार्च, 2008

ब्लॉग कविता : आधा आकाश

हम आधा आकाश मंगातें हैं ।
अपने लिए
जगह एक खास मंगातें हैं ।



अंधेरों को चीर के रख दें,
ऐसा एक प्रकाश मंगातें हैं ।
पुरुषों तुमसे हम
अपने लिए विश्वास मंगातें हैं ।

हमें भी दो मौका
कुछ कर गुजरने का ।

हमें स्थान तुमसे आगे नहीं चाहिए
स्थान हम अपना
पास -पास मंगातें हैं ।


अपने लिए नहीं
इस दुनिया के विकास के लिए


आधा आकाश मंगातें हैं ।
आधा आकाश मंगातें हैं ।


अपने लिए जगह एक खास मंगातें हैं ।



(ये कविता साल दो हजार तीन की तेरह फरवरी को chhindwara, mp में लिखी गई थी । मैं उस वक्त कॉलेज में था । जब मैंने इसे स्टेज से सुनाया तो ... girls की ओर से आवाज आई ... हमें पूरा आकाश चाहिए । मतलब साफ है... आधी आबादी को अपना आकाश चाहिए .... वे सिर्फ़ पाना चाहती है ... खोने के लिए उनके पास कुछ नहीं ... सो उनके लिए आधा आकाश ... )



तृष्णा तंसरी / 13 feb 2003